सावन की छटा (कविता)
घनघोर घटा मदमस्त महीना इसकी घटा कछु जाए कहीना सुंदर उपवन जग उजियारा मनमोहक मन मोहने वारा नदी करे कल-कल चहु ऒर झरना झर-झर करते शोर मस्ती से भर जाते मोर पंख फिलाते नाच दिखाते मीठी-मीठी मधु ध्वनि गाते कोयल रसमय गीत सुनाती फुदक-फुदक कर डाली-डाली जन हो जाते भाव विभोर नन्हे बच्चे करते रियाज़ कोयल बनने का करते प्रयास मेढ़क जल में करतब दिखलाता टर-टर कर मन बहलाता नव पल्लव भर जाते डाली जनु बसुधा बैठे ओढ़े हरियाली (सोनू शर्मा)