दिखावटी दुनियां

इस कविता में सांसारिक द्वंद को दिखाया है। सब अपने अपने हित साधन के लिए दूसरों को देखते है। किसी को किसी के हित की कोई चिंता नही है। यहां सब लोग अपनी सिद्धि के लिए दिखावे के व्यवहार करते है। झूठ को ही सत्य बना कर पेश किया जाता है। और उससे ही सत्य बना दिया जाता है। आज लोगों में दिखावे की मानो प्रतियोगिता चल रही हो सब लोग अपना जीवन दिखावे में ही नष्ट कर रहे हैं। इससे उनकी स्वाभाविक इच्छाओं का दमन हो जाता है। इसी को इंगित करते हिए यह कविता 'दिखावटी दुनियां' लिखी गयी है।


      झूठी है ये दुनिया यहाँ सब दिखावा हैं।
       दिखता नहीं झूठ सत्य बिकता है।
        यहाँ सब कुछ एक छलावा है।
      इस झूठे संसार में सब सजावटी है।
        जो सुंदर है वह बनावटी है।
         सबके चहेरे पर मुखोटा है।
   किसी का मन खोटा है किसी का दिल छोटा है।
        यहाँ सब दिखावे के परिणाम हैं।
          सबसे बड़ा झूठ जिसका 
      सबका उसी को सब का प्रणाम है।
      झूठी है ये दुनिया यहाँ सब दिखावा है।
         इस दिखावे के जीने मे ।
        सब कुछ दफन है सीने मैं।
         बस वही दिखता है जो 
         इस संसार को जंचता है।
   लोग अपना भूलकर दूसरों के समान जीते है।
       तभी तो दुखों के कड़वे घूँट पीते हैं।
        रो नही सकता कवि खुलकर 
        इस नश्वर संसार के डर से।
      पता चलेगा तो संसार हंसेगा मुझपर ।
    ये सोचकर दफन हो जाती है मन की शांति।
     झूठी है ये दुनिया यहाँ सब दिखावा हैं।।

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