दृश्य

इस रचना में दुर्घटना स्थल पर खड़े होकर देखने वाले लोगों पर व्यंग्य किया गया है। जो मदद करने की वजह उसमें भी अपना मनोरंजन देखते है।तथा मानवीय मानसिकता के सिमटने के कारण मनुष्य बहुत ही स्वार्थी और अनेक शंकाओं से ग्रसित हो गया है। साथ ही मैं इन रचना के लिए उपयुक्त शीर्षक चुनना आप पर छोड़ता हूँ। comment करके अवश्य बताएं।

                  वो देखने आए है दृश्य
                  कैसी होती है दुर्घटना
               मदद किसी की करनी नहीं
                 बस दूर से ही ताकना।
          ये देखने वाले है खड़े होके दूर से 
           हाथ तक पीड़ित को लगते नहीं
              बस खड़े होके फ़ोटो खींचते।
        वीडियो बनाते है स्टेटस भी लगते है
               खुद सहायता करते नहीं
          बस खड़े -खड़े सबको निहारते।
                  सारे बचना चांहते है
             एक दूसरे से नजरें भी चुराते है
       बातें बनाते है चुपचाप निकल जाते है।
                 साथ नही दे सकते तो 
                   एम्बुलेंस ही बुला दो
      इंसानियत बची हो थोड़ी उसे तो जगा लो।
             डरकर तुम पुलिस कचहरी से 
          मानवता को खोते हो बड़ा अचरज है
            क्यों?डरते हो पुलिस कचहरी से 
                ये पुलिस हमारी रक्षक है।

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